द गर्ल इन रूम 105–३१
इंस्पेक्टर राणा चलकर मेरे सामने आ खड़े हुए और मेरी आंखों में आंखें डालकर देखने लगे। मुझे अच्छी तरह घूरकर देखने के बाद वे सौरभ की ओर मुड़े और उससे पूछा, 'तुम्हारा दोस्त सच बोल रहा है?" सौरभ फ़िल्म 'जग्गा जासूस' के रनवीर कपूर की तरह बोला, 'हं...हं...हां, सरा'
'फिर तुम हकला क्यों रहे हो?" ऐ... ऐ... ऐसे ही, सर।'
'आर 'यू श्योर कि तुम लोगों ने ये मर्डर नहीं किया है?' राणा ने कहा। मुझे अपने पैरों तले जमीन खिसकती महसूस हुई। तो क्या हम पर ही शक किया जा रहा था? 'नहीं, सर। मां कसम खाकर कहता हूं, हमने नहीं किया।'
इंस्पेक्टर ने मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा, 'मादरचोद, हर क़ातिल स्साला अपनी मां की ही कसम
खाता है।"
'नहीं, सर, लेकिन...' मैंने कहा। मैं उनकी भाषा से हैरान था।
‘चोप्प, ' उन्होंने कहा और फिर कांस्टेबल की ओर मुड़कर बोले, 'इन दोनों को पुलिस थाने ले जाओ।'
'सर, आप...'
इंस्पेक्टर राणा ने मुझे बीच में ही टोक दिया, 'और वॉचमैन का भी बयान लो। एंट्रेंस के सीसीटीवी फुटेज हासिल करो। किसी ने लड़की के पैरेंट्स को ख़बर की?'
"मैंने की, सर उसके पापा आ रहे हैं, मैंने कहा।
सौरभ ने मेरे हाथ पर चिकोटी काटी, यह बताने के लिए कि मुझे अपना मुंह बंद रखना चाहिए। एक कांस्टेबल ने एरिया को मार्क किया और तस्वीरें खींचता रहा। मैं और सौरभ चुपचाप एक कोने में खड़े रहे। निगरानी अधिकारी आईआईटी डायरेक्टर को फोन करने के लिए बाहर चला गया। पुलिस वाले कमरे में यहां-वहां चक्कर काटते रहे। 'क्या हो रहा है यहां? ज़ारा कहां है?' सफ़दर लोन की आवाज़ सुनकर सभी चौंक गए।
'भारतीय पुलिस थाने टाइम ट्रैवल का एक अच्छा ज़रिया माने जा सकते हैं। यदि आप जानना चाहते हैं कि सत्तर के दशक में भारत कैसा था, जब कंप्यूटर नहीं थे और सरकारी दफ़्तर टनों भूरे काग़ज़ के मलबे में दबे रहते थे, तो किसी पुलिस थाने की सैर कर आइए। माना कि हौज खास स्टेशन इतना गया बीता भी नहीं है। वहां पर दो कंप्यूटर थे, दोनों ही मोटे-तगड़े सीआरटी मॉनिटर्स वाले उन पर नब्बे के दशक के विंडोज़ सॉफ्टवेयर्स चलाए जा रहे थे। सुबह के नौ बजे थे और थाना लोगों की भीड़ से इस तरह खचाखच भरा हुआ था, जैसे कि पुलिस 10 जीबी डाटा कार्ड फ्री बांट रही हो। नींद और बीती रात के नशे से पहले ही मेरा सिर चकरा रहा था। थाने की रेलमपेल से मेरी हालत और खराब हो गई।
सौरभ और मुझे अलग-अलग बैठाया गया। वे नहीं चाहते थे कि हम दोनों आपस में सांठ-गांठ करके कोई फ़र्ज़ी कहानी सुना डालें। जैसे कि अगर हम सच में ही वैसा करना चाहते तो एक-दूसरे को व्हॉट्सएप्प करके नहीं कर सकते थे।
वैसा
मैं कई घंटों तक इंतज़ार करता रहा। आखिरकार इंस्पेक्टर राणा ने मुझे अपने ऑफ़िस में बुलाया। ऑफ़िस क्या दड़वा कहिए, जिसमें उनकी डेस्क और दो कुर्सियां जैसे-तैसे उसी हुई थीं। मैं उनके सामने बैठा तो मुझे जम्हाई आ गई। एक नज़र मुझ पर जमाए हुए वे एक फ़ाइल पढ़ते रहे।
"नींद आ रही है?" 'थोड़ी-सी ।'
"मुंह धो आओ।'
ऐसे ही ठीक है।"" उन्होंने मुझे तीखी नज़रों से देखा।
'जो बोला है, वो करो,' उन्होंने कहा। मैंने उनकी बात मानने में ही भलाई समझी। एक गंदे बाथरूम के गंदे नल के गंदे पानी से मैंने अपना चेहरा धोया। फिर जाकर उनके ऑफ़िस में बैठ गया। इस बार मेरी आंखें पूरी तरह